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इस सीट पर असमंजस में भाजपा, इस दुर्ग को भेदना कांग्रेस के लिए रहा है सपना..

देहरादूनः विधानसभा चुनाव बस अब कुछ ही दूर हैं, उत्तराखंड में एक चरण में चुनाव 14 फरवरी को होने हैं। अभी तक आप आदमी पार्टी और यूकेडी ही ने अपने कुछ प्रत्याशियों के नाम फाइनल किए हैं। कांग्रेस और बीजेपी भी अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा जल्द करने वाला है लेकिन इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में कई नेताओं के सुर ढगमगा रहे हैं। अभी भी प्रदेश में दलबदल का दौर जारी है जब प्रत्याशियों की लिस्ट पिटारे से निकलेगी क्या तब नाराजगी का सुर ओर भी बुलंद होगा। यह अभी देखना शेष है। लेकिन अभी भाजपा अपनी एक सीट को लेकर असमंजस में है वह सीट है डोईवाला सीट…. डोईवाला विधानसभा सीट वैसे तो पारंपरिक रूप से भाजपा के वर्चस्व वाली सीट रही है। अभी तक विधानसभा चुनाव में भाजपा के इस दुर्ग को भेदना कांग्रेस के लिए एक सपने जैसा रहा है। आपको बता दें कि 2014 के उपचुनाव की जीत को छोड़ दें तो कांग्रेस को यहां सभी चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है, लेकिन 2022 के समर में भाजपा अपने इस अजेय दुर्ग को लेकर पहली बार असमंजस की स्थिति में दिखाई दे रही है। यह असमंजस दुर्ग में किसी दरार को लेकर नहीं है बल्कि इस बात को लेकर है कि इस बार पार्टी डोईवाला में किस चेहरे पर दांव खेलेगी।

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डोईवाला विधानसभा क्षेत्र भाजपा का गढ़ रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि पार्टी के भीतर यह मंथन तब हो रहा है जब इस सीट पर कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सीट से विधायक हैं। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इस सीट पर चुनाव लड़ने के प्रबल इच्छुक भी हैं और लगातार विधानसभा क्षेत्र में जनसंपर्क करते आ रहे हैं। लेकिन उनकी सक्रियता और इच्छा के बावजूद पार्टी के भीतर नए विकल्प की चर्चा हो रही है। यह चर्चा चुनाव क्षेत्र में टीम त्रिवेंद्र और भाजपा के नेटवर्क के लिए अजीब सी दुविधा पैदा कर रही है। आपको बता दें कि भाजपा सरकार के इस कार्यकाल में सबसे ज़्यादा करीब चार साल तक मुख्यमंत्री रहने वाले त्रिवेंद्र सिंह रावत के चुनाव पर सस्पेंस बन गया है। रावत डोईवाला सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां से वह तीन बार 2002, 2007 और 2017 का चुनाव जीते लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के सामने त्रिवेंद्र रावत को इस बार टिकट दिए जाने को लेकर असमंजस है क्योंकि उन्हें बीच कार्यकाल में ही मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था। यही नहीं त्रिवेंद्र रावत के कई फैसले धामी और तीरथ सिंह सरकार में बदले भी गए थे।

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भाजपा के पक्ष में रही सीट
डोईवाला सीट के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो राज्य गठन के बाद हुए 2002 और 2007 के विधानसभा चुनाव में त्रिवेंद्र सिंह रावत जीते। पहले चुनाव में बेशक उनकी जीत का अंतर 1536 वोटों का रहा। 2007 के चुनाव में यह अंतर 14127 वोटों का हो गया। 2012 के चुनाव में त्रिवेंद्र डोईवाला से रायपुर चले गए और वहां उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा, लेकिन डोईवाला सीट पर पार्टी की जीत हैट्रिक बनीं बेशक इस बार चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक थे। 2014 में निशंक लोकसभा का चुनाव लड़े और उपचुनाव में त्रिवेंद्र की डोईवाला सीट पर फिर वापसी हुई लेकिन इस बार डोईवाला के मतदाताओं ने उन्हें हरा दिया। कांग्रेस के हीरा सिंह बिष्ट चुनाव जीते। 2017 में पार्टी ने फिर त्रिवेंद्र पर ही दांव लगाया और वह रिकार्ड 24,608 मतों से विजयी हुए। 61 फीसदी मत हासिल कर त्रिवेंद्र को पार्टी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी और डोईवाला सीट देखते ही देखते वीवीआईपी सीट हो गई। भाजपा और कांग्रेस डोईवाला विधानसभा सीट के दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं। दोनों के प्रत्याशी अभी तय नहीं हो पाए हैं। इसलिए इस सीट पर सियासी हालात पर छाया कोहरा तभी कुछ हद छंटेगा जब दोनों ओर से प्रत्याशी घोषित होंगे।

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डोईवाला क्षेत्र को मुख्यमंत्री बनने का मिला लाभ
दिलचस्प बात यह है कि क्षेत्र के अधिकांश लोग यह मानते हैं कि पिछले पांच वर्ष में चुनाव क्षेत्र में विकास की गति धीमी नहीं पड़ी। भाजपा से जुड़े लोग विधि विवि, सीपैट, कास्ट कार्ड भर्ती केंद्र, डिग्री कॉलेज, कैंसर अस्पताल, ऑडिटोरियम, तहसील भवन, बस अड्डा, सूर्यधार झील, सड़कों, पुल जैसे फैसले और निर्माण त्रिवेंद्र के कार्यकाल की उपलब्धियां मानते हैं।
महंगाई और बेरोजगारी पर खाई मात
चुनाव क्षेत्र में त्रिवेंद्र के काम और महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की नाराजगी के बीच भी जंग है। कांग्रेस और विपक्षी दल सत्तारोधी रुझान के साथ महंगाई और बेरोजगारी और स्वास्थ्य, शिक्षा से जुड़े मुद्दों को मुख्य चुनावी हथियार बना रहे हैं। किसान आंदोलन का भी एक क्षेत्र विशेष में प्रभाव रहा है, जिसका कांग्रेस फायदा लेने की कोशिश कर रही है।
यहां पहाड़ी वोटर्स की है भूमिका अहम
विधानसभा क्षेत्र में पर्वतीय मतदाताओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। पहाड़ से पलायन लोग इस चुनाव क्षेत्र में बड़ी तादाद में बसे। सीट पर पर्वतीय और मैदानी मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर पहुंच चुकी है। इनमें करीब 15 फीसदी मुस्लिम और सिख मतदाता हैं।

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