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क्या भू-कानून रैली खा गई नरेन्द्र सिंह नेगी का पद्म पुरस्कार?

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Narendra Singh Negi. Hillvani News

Narendra Singh Negi. Hillvani News

वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।
हर साल गणतंत्र दिवस आता है और गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर यानी 25 जनवरी की शाम को देशभर के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों को पद्म पुरस्कार देने की घोषणा की जाती है। इनमें पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री पुरस्कार शामिल हैं। पद्म पुरस्कारों की इस सूची पर देशभर के साथ ही उत्तराखंड के लोगों की नजरें भी होती हैं। अब तक उत्तराखंड की कई विभूतियों को पद्म पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। उत्तराखंड के हिस्से में ज्यादातर पद्म पुरस्कार पर्यावरण के क्षेत्र में आये हैं। समाजसेवा, लोक कला और अन्य क्षेत्रों के लिए भी उत्तराखंड के लोगों को पद्म पुरस्कार प्रदान किये जा चुके हैं। लेकिन, उत्तराखंड के एक सर्वाधिक लोकप्रिय कवि, गायक और पहाड़ के जीवन के हर पहलू को अपने गीतों में संजोने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी को अब तक पद्म पुरस्कार न मिल पाने की टीस लगभग हर उत्तराखंडी की मन में है।

उत्तराखंड के लोग नरेन्द्र सिंह नेगी को गढ़रत्न कहते हैं। यह भारत रत्न से मिलता-जुलता नाम है और यह नाम साबित करता है कि आम उत्तराखंडी के मन में नेगी जी के प्रति किस तरह का श्रद्धा भाव है। हालांकि उत्तराखंड में प्रीतम भरतवाण, बसंती बिष्ट और माधुरी बड़थ्वाल जैसे लोकप्रिय लोक गायक हैं और यह संतोषजनक है कि उक्त तीनों लोक गायकों को पद्म पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। उत्तराखंड में गीतकारों और गायकों की एक लंबी फेहरिस्त है, जो बहुत शानदार काम कर रहे हैं। इसके बावजूद नरेन्द्र सिंह नेगी के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है कि यदि उत्तराखंड में सर्वश्रेष्ठ लोक रचनाकारों और लोक गायकों की सूची बनाई जाए तो पहले से 10वें नंबर तक नरेन्द्र सिंह नेगी ही होंगे। अगला जो भी नाम होगा, वह 11वें नंबर पर होगा। इसे एक अतिशयोक्तिपूर्ण कथन कहा जा सकता है, लेकिन यह कथन यह भी साबित करता है कि नरेन्द्र सिंह नेगी वास्तव में गढ़रत्न हैं और आम उत्तराखंडी के दिलों में राज करते हैं। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में नेगी जी के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जब लोक कला की बात आती है तो विरोधी भी उनके प्रशंसक होते हैं।

नेगी जी पिछले करीब 4 दशक से गढ़वाली गीत लिख रहे हैं और गा रहे हैं। कई अन्य रचनाकारों की रचनाएं गाकर वे उन रचनाओं को भी अमरत्व प्रदान कर चुके हैं। इतने बड़े रचनाकार और कलाकार को पद्म पुरस्कार दिये जाने की इच्छा सभी रखते हैं। यही वजह है कि पिछले कई वर्षों से हर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सार्वजनिक की जाने वाली पद्म पुरस्कारों की सूची में उत्तराखंड के लोग नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम तलाशते हैं और निराश होते हैं। हालांकि उनके प्रशंसकों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि नेगी जी पद्म पुरस्कारों से ऊपर हैं। यह बात जितनी सच है, उतनी ही सच बात यह भी है कि नेगी जी का हर प्रशंसक चाहता है उन्हें पद्म पुरस्कार मिले। 2015 में नेगी जी के जन्मदिन पर देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत की मौजूदगी में उन्हें पद्म पुरस्कार देने की मांग की गई थी। हाल ही में श्रीनगर में आयोजित बैकुंठ चतुदर्शी मेले में कुमार विश्वास ने भी मंच से नेगी जी को पद्म पुरस्कार देने की मांग की थी।

दरअसल यह मांग ऐसे ही नहीं की जाती है। सच यह है कि उत्तराखंड के लोक संगीत में नेगी जी का अवदान अद्वितीय है। वे लोक के सौन्दर्य, प्रेम, स्नेह, ममत्व से लेकर उसके दुःख-दर्द तक अपने गीतों में उकेरने वाले गीतकार और गायक हैं। नेगी जी अक्सर सत्ताओं के विरोध में भी गीत गाते रहे हैं। उनके एक गीत ने तो उत्तराखंड में सत्ता को ही पलट दिया था। वे असल में उत्तराखंडी लोक के सच्चे प्रतिनिधि हैं, जो हमेशा जनता के पक्ष में मजबूती के साथ खड़े नजर आते हैं। इस तरह से देखा जाए तो वे किसी भी नागरिक सम्मान के सच्चे हकदार हैं। हर बार उत्तराखंड के लोगों को उम्मीद रहती है कि नेगी जी का नाम इस बार अवश्य पद्म पुरस्कारों की सूची में होगा, लेकिन नहीं होता। इसके बाद हर बार इस बात पर चर्चा भी होती है। सोशल मीडिया पर भी और आम लोगों के बीच भी। इस बार, यानी 2024 में भी नेगी जी का नाम पद्म पुरस्कारों की सूची में नहीं था, लेकिन इस बार वैसी चर्चा नहीं हुई, जैसी कि हर बार होती है।

विश्वसनीय सूचना के अनुसार इस बार नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम पद्मश्री पुरस्कार के लिए अंतिम सूची में दर्ज था और बाद में अचानक गायब हो गया। नेगी जी ने कई मंचों से यह बात कही है कि वे किसी पुरस्कार के लिए आवेदन नहीं करेंगे। इस बार भी उन्होंने आवेदन नहीं किया था। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चाहते थे कि नेगी जी को पद्म पुरस्कार मिले। सरकार की ओर से ही नेगी जी से उनका बायोडाटा मांगा गया था। सितम्बर में उत्तराखंड सरकार की ओर से उनके नाम पर अंतिम मुहर लगाकर दिल्ली भेज दी गई थी। इस बार उत्तराखंड से सिर्फ नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम ही पद्म पुरस्कार के लिए भेजा गया था। फिर अचानक क्या हुआ कि जब 25 जनवरी की शाम को पद्म पुरस्कारों की सूची आई तो नेगी जी का नाम हर बार की तरह इस बार भी गायब था। उत्तराखंड के हिस्से में इस बार एक पद्म पुरस्कार आया। इतिहासकार डॉ. यशवंत कठोच को यह पुरस्कार दिया जा रहा है। डॉ. कठोच अपने क्षेत्र के जाने-माने व्यक्ति हैं। इतिहास पर कई पुस्तकों रचयिता हैं। वे भारत के उन गिने-चुने व्यक्तियों में शामिल हैं, जिन्हें ब्राह्मी लिपि पढ़नी आती है। डॉ. कठोच को पद्मश्री पुरस्कार दिया जाना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को सम्मान देना है। यह उत्तराखंड के लिए भी गर्व की बात है। लेकिन, फिर से सवाल यही कि नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम जब अंतिम सूची में था तो फिर अचानक सूची से नाम गायब कैसे हो गया? आशंका जताई जा रही है कि 24 दिसंबर की भूकानून रैली के समर्थन में अपील और गीत जारी करने के कारण नेगी जी का पद्म पुरस्कार रोक दिया गया।

दरअसल 24 दिसंबर 2024 को देहरादून में भूकानून मूल निवास स्वाभिमान रैली का आयोजन किया गया था। इस रैली की पहली कॉल एक अल्पज्ञात संगठन की ओर से दी गई थी और आम लोगों ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया था। इसी बीच 18 दिसंबर को नेगी जी की ओर से उनके फेसबुक पेज पर एक वीडियो और साथ में लिखित अपील जारी की गई। वीडियो में नेगी जी कहते हुए सुनाई दिये, ‘मूल निवास भूकानून समन्वय समिति आगामी 24 दिसंबर को महारैली का आयोजन करने जा रही है। सभी उत्तराखंडी भाई-बहनों से निवेदन है कि उक्त तिथि को परेड ग्राउंड देहरादून पहुंचकर इस लड़ाई को मजबूत करें। राज्य में मूल निवास व्यवस्था खत्म होने से हमारी पहचान का संकट पैदा हो गया है। 40 लाख से ज्यादा लोग यहां के मूल निवासी बन गये हैं, जिससे हमारे रोजगार, व्यवसाय तथा नई पीढ़ी का भविष्य प्रभावित हो रहा है’। नेगी जी की इस अपील में बाद पूरे राज्य में प्रस्तावित भूकानून मूल निवास रैली चर्चा के केंद्र में आ गई। राज्य के दूर-दराज के इलाकों से लोग देहरादून रैली में पहुंचने की तैयारी करने लगे। नतीजा यह हुआ कि 24 दिसंबर को देहरादून में एक बड़ा जनसैलाब उमड़ आया। न सिर्फ पहाड़ी जिलों से बल्कि दिल्ली, मुंबई और देश के अन्य शहरों में रहने वाले प्रवासी उत्तराखंडी भी देहरादून रैली में पहुंच गये। दून की सड़कों पर एक बार फिर 1994 के अलग उत्तराखंड आंदोलन जैसे हालात बन गये।

24 दिसंबर की रैली में हालांकि नेगी जी शामिल नहीं हो सके, लेकिन उनके फेसबुक पेज पर एक वीडियो आया। इस वीडियो में नेगी जी ने खुद के बदरीनाथ के पास गरुड़ में किसी कार्यक्रम में शामिल होने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि देहरादून में मूल निवास भूकानून रैली शुरू हो रही है। उन्होंने वीडियो में देहरादून महारैली की सफलता की शुभकामनाएं दी। इसके साथ की वीडियो में नेगी जी और उनके साथी कलाकारों ने एक गीत भी गया। बोल थे- जागी जावा, जागी जावा, धर्म धाद छौं लगाणु जागि जावा। बदरीनाथ के पास गरुड़ से भेजे गये इस गीत ने देहरादून की रैली में पहले से ज्यादा उत्साह भर दिया। संभावना जताई जा रही है कि भूकानून रैली के पक्ष में अपील करने के बाद ही नेगी जी के पास फिर से ऐसा न करने या फिर सरकार के पक्ष में कोई अपील करने का संदेश भेजा गया होगा। लेकिन, हर हाल में जनता के पक्ष में खड़े रहने वाले नेगी जी ने ऐसा करने से इंकार कर दिया होगा। नेगी जी से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनकी तरफ से पुरस्कार के लिए कोई आवेदन नहीं किया गया था और उन्हें किसी तरह की कोई जानकारी नहीं है।

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