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आस्था: चालदा महासू महाराज खुद पहुंचते हैं भक्तों को दर्शन देने, 24 वर्ष में पूरा होता है यात्रा का क्रम। पढ़े अद्भुत यात्रा..

यूं तो मन्नतें मांगने के लिए भगवान की शरण में मंदिर जाने की परंपरा है लेकिन अगर भगवान खुद ही मन्नत पूरी करने भक्तों के पास पहुंचे तो? ऐसा ही एक अद्भुत नजारा देखने को मिलता है उत्तराखंड के देहरादून जनपद के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में… जहां क्षेत्र के कुल देवता चालदा महासू महाराज गांव-गांव पहुंचकर भक्तों को ना केवल दर्शन देते हैं बल्कि उनकी इच्छाएं मनतें भी पूरी करते हैं। आपको बता दें कि चालदा महासू महाराज का भ्रमण करने का ये सिलसिला पीढ़ियों से चला आ रहा है जिस कारण इस देव को चालदा महाराज कहा जाता है जो अपने भक्तों के पास पहुंचने के लिए चलते रहते हैं।

भारत विभिन्न संस्कृतियों परपराओं और रीति-रिवाजों का देश है। जब उत्तराखंड की धार्मिक सांस्कृतिक परंपराओं का जिक्र होता है तो जौनसार का क्षेत्र इन सब में अतुल्य, अद्भुत, अग्रणी है। जौनसार क्षेत्र के समाल्टा गांव में छत्रधारी चालदा महाराज 67 वर्ष बाद स्थानीय समाल्टा मंदिर में विराजमान हुए है। देवता के मंदिर प्रांगण में पहुंचते ही आसपास का पूरा क्षेत्र चालदा महाराज की जय कार से गूंज उठा था और लोगों में देव वर्णन के लिए होड़ मच गई थी। इस क्षेत्र के लोगों के कुल देवता चालदा महासू महाराज है। जो हर साल जौनसार बावर के साथ ही उत्तराखंड के जौनसार-उत्तरकाशी क्षेत्र और हिमाचल के बड़े भूभाग पर भ्रमण करते हैं। किसी भी गांव में पहुंचने पर चालदा महाराज एक साल तक उसी गांव में प्रवास करते हैं। इस दौरान गांव से देवता की विदाई और दूसरे गांव में देवता के स्वागत का नजारा देखने लायक होता है। देवता की विदाई करने वाला गांव भरी आंखों से उन्हें विदा करते हैं तो दूसरा गांव देवता का स्वागत नाच गाने के साथ स्वागत करते हैं।

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चालदा महासू महाराज हैं क्षेत्र के अराध्य
आपको बता दें कि भगवान भोलेनाथ के अंश कहे जाने वाले महासू महाराज इस जौनसार बावर क्षेत्र के अराध्य देवता हैं। चालदा महासू महाराज इसी तरह सदियों से इस क्षेत्र का भ्रमण कर लोगों की मन्नतें पूरी करते हैं। इस बार देवता मोहना गांव में एक साल गुजारने के बाद समाल्टा गांव पहुंचे हैं। देवता के भ्रमण के दौरान हजारों लोग उनके दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जिससे साफ है कि लोगों में चालदा महासू महाराज के प्रति अपार आस्था और श्रृद्धा है। देवताओं के प्रति अपार आस्था आज भी उत्तराखंड के लोगों में मौजूद हैं। इसलिए ही शायद उत्तराखंड को देव भूमि भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि अपने संपूर्ण जीवन काल में एक आम इंसान चालदा महाराज के एक बार ही दर्शन कर पाता है और यदि किसी व्यक्ति को अपने जीवन काल में दो बार चालदा महाराज के दर्शन हो जाए तो वह व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली होता है।

छत्तराई होता है आकर्षण का केंद्र
पौराणिक मान्यता है कि जिन भी मार्गों से छत्रधारी चालदा महाराज गुजरते हैं वहां के ग्रामीण देव डोली पर पुष्प वर्षा कर खुशहाली की मनत मांगते हैं। चालदा महाराज के प्रवास के दौरान उनका छत्तराई आकर्षण का केंद्र होता है। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु इस छत्र के नीचे से गुजर जाता है तो उसे पूरी यात्रा के दौरान छत्र के साथ साथ चलना पड़ता है। इस बार 250 छत्तराई उनके साथ चल रहे थे। छत्तराई को देखते ही लोगों के सिर श्रद्धा पूर्वक झुक जाते हैं इस बार पूरे जौनसार बावर समेत उत्तरकाशी, हिमाचल प्रदेश से भी लोग देव दर्शन के लिए पहुंचे थे। खतशैली के ग्रामीणों की ओर से जगह-जगह विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया था।

जानिए चालदा महाराज के प्रवास यात्रा का क्या है क्रम?कश्मीर से हनोल की महासू महाराज की प्रवास यात्रा का एक लंबा क्रम है, हनोल में प्रकटीकरण के पश्चात बोटा महाराज हनोल में ही विराजित रहते हैं जबकि चालदा महाराज जौनसार  बावर, उत्तरकाशी एवं हिमाचल प्रदेश में प्रवास करते हैं। चालदा महाराज की प्रवास यात्रा के इतिहास की लंबी कढ़ी है परंतु ब्रिटिश सरकार ने चालदा महाराज के प्रवास को दो भागों में विभक्त किया था। एक भाग साटी बिल (तरफ) मतलब जौनसार बावर एवं आंशिक हिमाचल का क्षेत्र जिसके वजीर दीवान सिंह जी है जो बावर क्षेत्र के बास्तील गांव के निवासी है और दूसरा भाग पासी बिल मतलब उत्तरकाशी जनपद व हिमाचल प्रदेश का कुछ क्षेत्र जिसके वजीर जयपाल सिंह जी है जो उडीयार गांव के निवासी है। (यहां यह बात ध्यान रखने योग्य है कि चालदा महाराज के वजीर महाराज के प्रवास यात्रा की संपूर्ण व्यवस्था करते हैं। कहां पर कब प्रवास होना है यह तय करने का अधिकार वजीर को है अर्थात वजीर को बोलांदा महासू भी कहा जाता है)

इसी अनुसार चालदा महाराज 12 वर्ष तक साटी तरफ प्रवास करेंगे और ठीक 12 बरस पासी की तरफ प्रवास करेंगे। परंतु यह निश्चित है कि जब साटी तरफ का प्रवास पूर्ण हो जाएगा तो एक रात के लिए महाराज हनोल रूकेंगे। इसी प्रकार जब पासी तरफ का प्रवास पूर्ण होगा उसके बाद भी एक रात्रि के लिए महाराज हनोल रुकते हैं। और फिर नए सिरे से प्रवास का क्रम जारी होता है।
कहां कहां होता है साटी तरफ प्रवास
चालदा महाराज की प्रवास यात्रा बावर क्षेत्र के कोटी गांव में प्रारंभ होती है। और हर स्थान पर महाराज के रुकने की समय सीमा भी निर्धारित की गई होती है परंतु परिस्थितिवश महाराज के निर्धारित स्थानों (गांव) पर रुकने की सीमाएं आगे पीछे भी हो जाती है। महाराज की प्रवास यात्रा का कम कोटी से प्रारंभ होता है और टोंस नदी के पार देवघार खत के मुन्धोल में 1 साल के लिये विराजित होते हैं। इसके पश्चात हिमाचल प्रदेश के थ्रोच में 1 वर्ष, जानोगी चोपाल 1 वर्ष, कोटी कनासर 1 वर्ष मोहन खत 1 वर्ष, समाल्टा 1 वर्ष, हाजा दसोऊ पसगांव (जेस्ट खत मानी जाती है) 2 वर्ष, मसक खत भरम 1 वर्ष, किस्तुङ खत लखोऊ 1 वर्ष और फिर वापस चालदा महाराज पुन: कोटी बावर प्रवास पर आते हैं। जहां 6 माह तक रुकते हैं।

पासी की तरफ प्रवास होता है यहां
इसके पश्चात पासी तरफ की यात्रा प्रारंभ होती है एक रात हनोल रुकने के पक्षात देवता टडीयार उत्तरकाशी के लिए प्रस्थान करते हैं। फिर यात्रा का क्रम प्रारंभ होता बुटाणु बंगाण पींगल पट्टी 1 वर्ष, जीवा कोटीगाड़ 1 वर्ष, बामसु मासमोर पट्टी 1 वर्ष, वितरी गांव फतेहपुर वक्त 2 वर्ष, खसधार हिमाचल प्रदेश 2 वर्ष, भरसाठा धार जुब्बत हिमाचल प्रदेश 1 वर्ष, सराजी जुब्बल हिमाचल प्रदेश 1 वर्ष, बुटाणु उत्तरकाशी 1 वर्ष और फिर एक रात के लिए टडीयार और तत्पश्चात एक रात के लिए चालदा महाराज हनोल में प्रवास करेंगे। 24 वर्ष में यात्रा का यह क्रम पूरा होता है इसके पश्चात फिर कोटी बावर से चालदा महाराज की यात्रा का दूसरा चक्र प्रारंभ होता है।

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