जनगणना के दौरान रहें बेहद सतर्क, गलत जानकारी देने या सहयोग से इनकार पर हो सकती है सजा…
भारत की आगामी जनगणना 2027 को लेकर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। इसी बीच नागरिकों के बीच उत्सुकता और भ्रम दोनों बढ़ रहे हैं। लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि अगर गलत जानकारी दी गई तो क्या होगा? एक आम डर यह है कि क्या गलत जवाब देने पर किसी को पुलिस भी हिरासत में ले सकती है? इसी महीने शुरू होने जा रहे जनगणना के पहले चरण के बीच अगर किसी अधिकारी-कर्मचारी ने नियमों का उल्लंघन या लापरवाही की तो उसे तीन साल की जेल हो सकती है। वहीं, जनगणना में सहयोग न करने वाले आमजन पर भी कानूनी कार्रवाई के तहत जुर्माना लग सकता है। भारत के महापंजीयक की ओर से उत्तराखंड समेत देशभर के जनगणना निदेशालयों को जनगणना अधिनियम 1948 को लेकर सर्कुलर जारी किया गया है। इस अधिनियम के तहत न केवल आम जनता बल्कि जनगणना कार्य में लगे अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय की गई है। पहले चरण के तहत पोर्टल se.census.gov.in पर मकान स्वगणना 10 अप्रैल से, मकान सूचीकरण व गणना 25 अप्रैल से 24 मई तक होगी।
अधिकारी-कर्मचारियों पर ये होगी कार्रवाई
जनगणना अधिनियम 1948 की धारा-11 के तहत यदि कोई जनगणना अधिकारी या जनगणना में सहायता के लिए कानूनी रूप से बाध्य व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करने से इनकार करता है या किसी अन्य को काम करने से रोकता है तो उसे तीन साल तक का कारावास और 1,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। यदि कोई कर्मचारी अपने कर्तव्य के पालन में उचित तत्परता नहीं बरतता या उपेक्षा करता है तो वह दंड का भागी होगा। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर अनुचित प्रश्न पूछता है, गलत डेटा तैयार करता है या सरकार की अनुमति के बिना जनगणना की जानकारी लीक करता है तो उसे कारावास और जुर्माना दोनों भुगतने पड़ सकते हैं। जनगणना दस्तावेजों को छिपाने, नष्ट करने या उनके परिणामों में हेराफेरी करने वाले कर्मचारियों के लिए भी सख्त सजा का प्रावधान है।
आम जनता पर ये हो सकती है कार्रवाई
जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 8, 11 और 15 के तहत जनगणना के दौरान आम नागरिकों के लिए भी कुछ नियम अनिवार्य हैं, जिनका उल्लंघन अपराध माना जाएगा। यदि कोई व्यक्ति जनगणना अधिकारी की ओर से पूछे गए अनिवार्य प्रश्नों का जानबूझकर गलत उत्तर देता है या उत्तर देने से इनकार करता है तो उस पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। जनगणना के उद्देश्य से किसी घर या स्थान में अधिकारी के प्रवेश को रोकना या जनगणना के लिए लगाए गए नंबरों और चिह्नों को मिटाना या बदलना दंडनीय अपराध है। यदि किसी घर के अधिभोगी या संस्थान के प्रबंधक को जनगणना फॉर्म भरने को कहा जाए और वह बिना वैध कारण के इसमें विफल रहता है या गलत जानकारी भरता है, तो उसे जुर्माना भरना होगा। जनगणना कार्यालय में अनधिकृत रूप से प्रवेश करने पर भी जुर्माने का प्रावधान है।
जनगणना अधिनियम के तहत कानूनी जिम्मेदारी
जनगणना अधिनियम 1948 साफ तौर से कहता है कि हर नागरिक जनगणना के दौरान सटीक जानकारी देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। यह कोई वैकल्पिक चीज नहीं है। अधिनियम की धारा 8 के तहत जब कोई जनगणना अधिकारी सवाल पूछता है तो व्यक्तियों को सभी सवालों के जवाब सच्चाई से देने होंगे। इन कड़े नियम के पीछे का विचार काफी आसान है। सरकारी नीति, कल्याणकारी योजना और राष्ट्रीय योजना काफी हद तक सटीक जनगणना के डेटा पर ही निर्भर करती हैं।
क्या पुलिस आपको गिरफ्तार कर सकती है?
पुलिस सिर्फ इस वजह से तुरंत आकर आपको गिरफ्तार नहीं करेगी क्योंकि आपने कोई गलत जवाब दिया है। जनगणना से जुड़े उल्लंघन को आपातकालीन अपराधिक अपराधों की तरह नहीं माना जाता है। हालांकि अगर यह पाया जाता है कि किसी ने जानबूझकर गलत जानकारी दी है या फिर सहयोग करने से इनकार कर दिया है तो कानूनी कार्यवाही शुरू की जा सकती है।
अगर गलत जानकारी दें तो क्या होगा?
अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देता है या फिर जरूरी जानकारी को छुपाता है तो इसे अधिनियम की धारा 11 के तहत दंडनीय अपराध माना जाता है। कानून के मुताबिक ₹1000 तक का जुर्माना, 3 साल तक की कैद या दोनों का प्रावधान है।
भाग लेने से इनकार करना भी एक अपराध
कुछ लोग सोच सकते हैं कि वे सवालों के जवाब देना छोड़ सकते हैं। लेकिन कानून इसकी इजाजत नहीं देता। जानकारी देने से मना करना या फिर किसी जनगणना अधिकारी के काम में बाधा डालना भी दंडनीय है।
जनगणना अधिकारियों के लिए नियम
जनगणना अधिकारी भी कड़े नियमों से बंधे होते हैं। अगर कोई अधिकारी अनुचित या फिर आपत्तिजनक सवाल पूछता है, इकट्ठा किए गए डेटा का गलत इस्तेमाल करता है या फिर अपने कर्तव्य में लापरवाही दिखता है तो उन्हें भी दंड का सामना करना पड़ सकता है। इसमें जेल की सजा भी शामिल है।
